प्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र – Pragna Vivardhana Kartikeya

प्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र एक अत्यंत प्रभावशाली संस्कृत स्तोत्र है, जो भगवान कार्तिकेय (मुरुगन, स्कंद) को समर्पित है। यह स्तोत्र विशेष रूप से बुद्धि, मेधा, ज्ञान और आत्मबल को बढ़ाने हेतु पाठ किया जाता है। “प्रज्ञा” का अर्थ होता है – गहरी बुद्धिमत्ता, विवेक और समझदारी। इस स्तोत्र में भगवान कार्तिकेय की महिमा, उनका तेजस्वी स्वरूप, और उनके वरदानी स्वभाव का वर्णन किया गया है, जिससे साधक की मानसिक क्षमताएँ विकसित होती हैं और पढ़ाई, प्रतियोगिता या कोई भी ज्ञान-साधना में सफलता मिलती है।

Pragna Vivardhana Kartikeya
प्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र

श्रीगणेशाय नमः ।
स्कन्द उवाच ।
योगीश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निनन्दनः ।
स्कन्दः कुमारः सेनानीः स्वामी शङ्करसम्भवः ॥ १॥

गाङ्गेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः ।
तारकारिरुमापुत्रः क्रौञ्चारिश्च षडाननः ॥ २॥

शब्दब्रह्मसमुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहः ।
सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रदः ॥ ३॥

शरजन्मा गणाधीशपूर्वजो मुक्तिमार्गकृत् ।
सर्वागमप्रणेता च वाञ्छितार्थप्रदर्शनः ॥ ४॥

अष्टाविंशतिनामानि मदीयानीतियः पठेत् ।
प्रत्यूषं श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत् ॥ ५॥

महामन्त्रमयानीति मम नामानुकीर्तनम् ।
महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ६॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले प्रज्ञाविवर्धनाख्यं श्रीमत्कार्तिकेयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


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