इंद्रकृत श्रीराम स्तोत्र एक प्राचीन संस्कृत स्तोत्र है, जिसे देवों के राजा इंद्र ने भगवान श्रीराम की स्तुति में रचा था। यह स्तोत्र अध्यात्म रामायण के युद्ध कांड के 13वें सर्ग में वर्णित है। इसमें कुल 9 श्लोक हैं, जिनमें श्रीराम की दिव्यता, करुणा, शक्ति और भक्तवत्सल स्वरूप का वर्णन किया गया है।
इस स्तोत्र में इंद्र अपने अहंकार का त्याग कर श्रीराम की शरण में आते हैं और स्वीकार करते हैं कि केवल श्रीराम ही संसार के सत्य, शक्ति और मोक्ष का आधार हैं। यह स्तोत्र भक्ति, विनम्रता, और आत्मसमर्पण का प्रतीक है, जिसे पढ़ने से मन की शुद्धि, अहंकार का नाश और श्रीराम की कृपा की प्राप्ति होती है।
Indrakrat Shree Ram Stotra
इन्द्रकृत श्री रामस्तोत्र
भजेऽहं सदा राममिन्दीवराभं भवारण्यदावानलभाभिधानम् ।
भवानीह्रदा भावितानन्दरूपं भवाभावहेतुं भवादिप्रपन्नम् ।।1।।
सुरानीकदुखौघनाशैकहेतुं नराकारदेहं निराकारमीडयम् ।
परेशं परानन्दरूपं वरेण्यं हरिं राममीशं भजे भारनाशम् ।।2।।
प्रपन्नाखिलानन्ददोहं प्रपन्नं प्रपन्नार्तिनि:शेषनाशाभिधानम् ।
तपोयोगयोगीशभावाभिभाव्यं कपीशादिमित्रं भजे राममित्रम् ।।3।।
सदा भोगभाजां सुदूरे विभान्तं सदा योगभाजामदूरे विभान्तम् ।
चिदानन्दकन्दं सदा राघवेशं विदेहात्मजानन्दरूपं प्रपधे ।।4।।
महायोगमायाविशेषानुयुक्तो विभासीश लीलानराकारवृत्ति: ।
त्वदानन्दलीलाकथापूर्णकर्णा: सदानन्दरूपा भवन्तीह लोके ।।5।।
अहं मानपानाभिमत्तप्रमत्तो न वेदाखिलेशाभिमानाभिमान: ।
इदानीं भवत्पादपद्मप्रसादात् त्रिलोकाधिपत्याभिमानो विनष्ट: ।।6।।
स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिरामं धराभारभूतासुरानीकदावम् ।
शरच्चन्द्रवक्त्रं लसप्तद्मनेत्रं दुरावारपारं भजे राघवेशम् ।।7।।
सुराधीशनीलाभ्रनीलांगकान्तिं विराधादिरक्षोवधाल्लोकशान्तिम् ।
किरीटादिशोभं पुरारातिलाभं भजे रामचन्द्रं रघूणामधीशम् ।।8।।
लसच्चन्द्रकोटिप्रकाशादिपीठे समासीनमंके समाधाय सीताम् ।
स्फुरद्धेमवर्णां तडित्पुञ्जभासां भजे रामचन्द्रं निवृत्तार्तितन्द्रम् ।।9।।
।। इति इंद्रकृत श्रीराम स्तोत्र संपूर्णम ।।
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