Lakshmi Narasimha Karavalamba Stotram

“Lakshmi Narasimha Karavalamba Stotram” भगवान नरसिंह और माता लक्ष्मी को समर्पित एक शक्तिशाली स्तोत्र है। इसका अर्थ होता है — ‘हे लक्ष्मी-नरसिंह, मुझे अपना हाथ देकर सहारा दो।’ यह स्तोत्र आचार्य शंकराचार्य द्वारा रचा गया माना जाता है और भक्त इसे दुख, भय और जीवन की कठिनाइयों से मुक्त होने के लिए पढ़ते हैं।

जो कोई इसे श्रद्धा से पढ़ता है, उसे भगवान नरसिंह देव की कृपा से शत्रु भय, नकारात्मक शक्तियाँ और मानसिक कष्ट दूर होते हैं। यह स्तोत्र साधक के मन में सुरक्षा का भाव देता है और जीवन में आत्मविश्वास बढ़ाता है। माता लक्ष्मी की कृपा से घर में सुख-समृद्धि भी बनी रहती है।

इस स्तोत्र का पाठ प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में या सूर्यास्त के बाद शांत वातावरण में करना श्रेष्ठ माना गया है। नरसिंह चतुर्दशी या शनिवार के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी होता है। जब जीवन में भय या परेशानी अधिक महसूस हो, तब भी श्रद्धा से इसका पाठ करना लाभकारी रहता है।

Lakshmi Narasimha Karavalamba Stotram
श्रीलक्ष्मीनृसिंहकरुणारस अथवा करावलम्बस्तोत्रम्

श्रीमत्पयोनिधिनिकेतनचक्रपाणे
भोगीन्द्रभोगमणिराजितपुण्यमूर्ते ।
योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १॥

ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-
सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त ।
लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २॥

संसारघोरगहने चरतो मुरारे
मारोग्रभीकरमृगप्रचुरार्दितस्य । var मृगप्रवरर्धितस्य
आर्तस्य मत्सरनिदाघसुदुःखितस्य var निधाघनिपीडतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ३॥

संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं
सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।
दीनस्य देव कृपया पदमागतस्य var शरणागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ४॥

संसारसागरविशालकरालकाल-
नक्रग्रहग्रसितनिग्रहविग्रहस्य । var ग्रहग्रसन
व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनिपीडितस्य var रागलसदूर्नमिनि
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ५॥

संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-
शाखायुतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम् ।
आरुह्य दुःखफलितं चकितं दयालो var दुःखजलधौ पततो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ६॥

संसारसर्पविषदिग्धमहोग्रतीव्र- var (घनवक्त्र)(विषदष्ट)भयोग्रतीव्र
दंष्ट्राग्रकोटिपरिदष्टविनष्टमूर्तेः । var दंष्ट्राकरालविषदग्ध
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ७॥

संसारदावदहनाकरभीकरोग्र- var दावदहनातुरभीकरोरु-
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य । var अभिदग्ध
त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्य var सरसीं शरणागतस्य, रुहमस्तकस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ८॥

संसारजालपतितस्य जगन्निवास
सर्वेन्द्रियार्थबडिशाग्रझषोपमस्य । var बडिशश्वझषात्मनश्च
प्रोत्कम्पितप्रचुरतालुकमस्तकस्य var प्रोत्तम्बित
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ९॥

संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-
निष्पीड्यमानवपुषः सकलार्तिनाश । var कलार्धितस्य
प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १०॥

अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य
चोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेयैः ।
मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ११॥

लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो
वैकुण्ठ कृष्ण मधुसूदन पुष्कराक्ष ।
(पाठभेद- यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप ।)
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव
देवेश देहि कृपणस्य करावलम्बम् ॥ १२॥

यन्माययार्जितवपुःप्रचुरप्रवाह-
मग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलम्बम् ।
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शङ्करेण ॥ १३॥

संसारसागरनिमज्जनमुह्यमानं
दीनं विलोकय विभो करुणानिधे माम् ।
प्रह्लादखेदपरिहारपरावतार
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १४॥

बद्ध्वा गले यमभटा बहु तर्जयन्तः
var भद्वाकशैर्यनुभटाबहुभर्तृयन्ति
कर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युतं माम् ।
var कर्षन्ति यत्र पथि पाशशतैर्यथा माम्
एकाकिनं परवशं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १५॥

एकेन चक्रमपरेण करेण शङ्ख-
मन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन् ।
वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नं var वरदाभयहस्तमुद्रां
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १६॥

प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-
व्यासादिभागवतपुङ्गवहृन्निवास ।
var व्यासाम्बरीष शुकशौनक हृन्निवास
भक्तानुरुक्तपरिपालनपारिजात
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १७॥

संसारयूथ गजसंहतिसिंहदंष्ट्रा
भीतस्य दुष्टमैदैत्य भयङ्करेण ।
प्राणप्रयाण भवभीति निवारणेन
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १८॥

लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण ।
ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता-
स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम् ॥ १९॥

आद्यन्तशून्यमजमव्ययमप्रमेय-
मादित्यरुद्रनिगमादिनुतप्रभावम् ।
त्वाम्भोधिजास्य मधुलोलुपमत्तभृङ्गीं
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २०॥

वाराह-राम-नरसिंह-रमादिकान्ता
क्रीडाविलोलविधिशूलिसूरप्रवन्द्य! ।
हंसात्मकं परमहंस विहारलीलं
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २१॥

स्वामी नृसिंहः सकलं नृसिंहः
माता नृसिंहश्च पिता नृसिंहः ।
भ्राता नृसिंहश्च सखा नृसिंहः
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २२॥

प्रह्लादमानससरोजवासभृङ्ग!
गङ्गातरङ्गधवळाङ्ग रमास्थिताङ्क! ।
श‍ृङ्गार सुन्दरकिरीटलसद्वराङ्ग
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २३॥

श्री शङ्करार्य रचितं सततं मनुष्यः
स्तोत्रं पठेदिह तु सर्वगुणप्रपन्नम् ।
सद्योविमुक्तकलुषो मुनिवर्यगण्यो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ २४॥

श्रीमन् नृसिंह विभवे गरुडध्वजाय
तापत्रयोपशमनाय भवौषधाय ।
तृष्णादिवृश्चिक-जलाग्नि-भुजङ्ग-रोग
क्लेशव्ययाम हरये गुरवे नमस्ते ॥ २५॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
लक्ष्मीनृसिंहकरुणारसस्तोत्रं अथवा
लक्ष्मीनृसिंहकरावलम्बस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या Lakshmi Narasimha Karavalamba Stotram रोज़ पढ़ सकते हैं?

हाँ, रोज़ पाठ करने से साधक के मन से डर और चिंता दूर होती है। रोज़ भगवान नरसिंह का स्मरण जीवन में शक्ति और सुरक्षा देता है।

क्या इसे घर पर पढ़ सकते हैं या मंदिर जाना ज़रूरी है?

इसे आप घर में भगवान नरसिंह की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर श्रद्धा से पढ़ सकते हैं। मंदिर में सामूहिक पाठ से भी इसका प्रभाव बढ़ जाता है।

क्या इसे विशेष दिन ही पढ़ना चाहिए?

आप इसे जब भी चाहें पढ़ सकते हैं। लेकिन नरसिंह जयंती, नरसिंह चतुर्दशी और शनिवार को इसका पाठ विशेष फलदायी माना गया है।

क्या बच्चे भी इसका पाठ कर सकते हैं?

बच्चों को माता-पिता इसका सरल अर्थ समझा कर या भजन के रूप में सुनाना चाहिए। इससे उनमें डर या असुरक्षा की भावना कम होती है।


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