Shiv Shankar Stotra

Shiv Shankar Stotra एक भक्तिपूर्ण स्तुति है जो भगवान शिव के कल्याणकारी (शंकर) रूप की महिमा का गुणगान करती है। यह स्तोत्र विभिन्न पुराणों या संतों द्वारा रचित हो सकता है, क्योंकि “शिव शंकर स्तोत्र” नाम से कई भक्तिपाठ प्रसिद्ध हैं। इस नाम से कोई एक अत्यंत विशेष ग्रंथ-निर्धारित स्तोत्र नहीं है, लेकिन “Shiv Shankar Stotra” शीर्षक से आमतौर पर भगवान शिव के सौम्य और रक्षक स्वरूप को समर्पित स्तोत्र समझा जाता है।

श्री शंकर स्तोत्र

अतिभीषणकटुभाषणयमकिंकरपटली-कृतताडनपरिपीडनमरणागतसमये ।

उमया सह मम चेतसि यमशासन निवसन् हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ १ ॥

असदिन्द्रियविषयोदयसुखसात्कृतसुकृतेः परदूषणपरिमोक्षण कृतपातकविकृतेः ।

शमनाननभवकानननिरतेर्भव शरणं हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ २ ॥

विषयाभिधबडिशायुधपिशितायितसुखतो मकरायितगतिसंसृतिकृतसाहसविपदम् ।

परमालय परिपालय परितापितमनिशं हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ ३ ॥

दयिता मम दुहिता मम जननी मम जनको मम कल्पितमतिसन्ततिमरुभूमिषु निरतम् ।

गिरिजासख जनितासुखवसतिं कुरु सुखिनं हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ ४ ॥

जनिनाशन मृतिमोचन शिवपूजननिरतेः अभितोऽदृशमिदमीदृशमहमावह इति हा ।

गजकच्छपजनितश्रम विमलीकुरु सुमतिं हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ ५ ॥

त्वयि तिष्ठति सकलस्थितिकरुणात्मनि हृदये वसुमार्गणकृपणेक्षणमनसा शिवविमुखम् । अकृताह्निकमसुपोषकमवताद् गिरिसुतया हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ ६ ॥

पितरावतिसुखदाविति शिशुना कृतहृदयौ शिवया हृतभयके हृदि जनितं तव सुकृतम् ।

इति मे शिव हृदयं भव भवतात् तव दयया हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ ७ ॥

शरणागतभरणाश्रितकरुणामृतजलधे शरणं तव चरणौ शिव मम संसृतिवसतेः ।

परिचिन्मय जगदामयभिषजे नतिरवतात् हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ ८ ॥

विविधाधिभिरतिभीतिभिरकृताधिकसुकृतं शतकोटिषु नरकादिषु हतपातकविवशम् ।

मृड मामव सुकृती भव शिवया सह कृपया हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ ९ ॥

कलिनाशन गरलाशन कमलासनविनुत कमलापतिनयनार्चित करुणाकृतिचरण ।

करुणाकर मुनिसेवित भवसागरहरण हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ॥ १० ॥

विजितेन्द्रियविबुधार्चितविमलाम्बुजचरण भवनाशन भयनाशन भजिताङ्गितहृदय ।

फणिभूषण मुनिवेषण मदनान्तक शरणं शिव शङ्कर शिव शङ्कर हर मे हर दुरितम् ॥ ११ ॥

त्रिपुरान्तक त्रिदशेश्वर त्रिगुणात्मक शम्भो वृषवाहन विषदूषण पतितोद्धर शरणम् ।

कनकासन कनकाम्बर कलिनाशन शरणं शिव शङ्कर शिव शङ्कर हर मे हर दुरितम् ॥ १२॥


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