चतुःश्लोकी स्तोत्र एक अत्यंत प्रभावशाली और सारगर्भित स्तोत्र है जो भगवान विष्णु (या कभी-कभी देवी लक्ष्मी) की स्तुति में रचा गया है। यह केवल चार श्लोकों में ही ब्रह्मज्ञान, भक्ति और वैदिक दर्शन का सार प्रस्तुत करता है। इसे भगवत गीता या भागवत पुराण से संबंधित गूढ़ ज्ञान के रूप में भी माना जाता है।
Chatushloki Stotra
चतुःश्लोकी स्तोत्र
सदा सर्वात्मभावेन भजनीयो व्रजेश्वरः ।
करिष्यति स एवास्मदैहिकं पारलौकिकम् ॥ १ ॥
अन्याश्रयो न कर्तव्यः सर्वथा बाधकस्तु सः ।
स्वकीये स्वात्मभावश्च कर्तव्यः सर्वथा सदा ॥ २ ॥
सदा सर्वात्मना कृष्णः सेव्यः कालादिदोषनुत् ।
तद्भक्तेषु च निर्दोषभावेन स्थेयमादरात् ॥ ३ ॥
भगवत्येव सततं स्थापनीयं मनः स्वयम् ।
कालोऽयं कठिनोऽपि श्रीकृष्णभक्तान्न बाधते ॥ ४ ॥
इति श्रीविट्ठलेश्वरोक्ता (द्वितीया) चतुःश्लोकी समाप्ता ।


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