चतुःश्लोकी भागवत (Chatushloki Bhagavat) भागवत पुराण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने सिर्फ चार श्लोकों में सम्पूर्ण भागवत तत्वज्ञान का सार ब्रह्मा जी को प्रदान किया है। इसे “भागवत का बीज” भी कहा जाता है, क्योंकि इसी में संपूर्ण श्रीमद्भागवत की भावनात्मक और दार्शनिक जड़ें छिपी हैं।
Chatushloki Bhagwat
चतुःश्लोकी भागवत
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद यत् सदसत परम। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम।।
ऋतेऽर्थ यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो माया यथाऽऽभासो यथा तमः।।
यथा महान्ति भूतानि भूतेषुच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेषवहम।।
एतावदेव जिज्ञास्यं त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः। अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा।।


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